श्रद्वांजलि …शरद श्रीवास्तव:अब तुम्हारे बगैर बहुत रुलाएगा ग्वालियर

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-हरीश पाठक

जिस बात से हम सब डर रहे थे वह डर सच में बदल गया और शनिवार की रात दस बजे तुम्हारी सांसें थम गयीं प्रिय शरद श्रीवास्तव।12 दिन तक मुम्बई के नानावटी अस्पताल में प्रख्यात चिकित्सक अब्दुल अंसारी के सारे प्रयास असफल साबित हुए।कोरोना के नेगेटिव होने के बावजूद फेफड़े और किडनी का संक्रमण तुम्हारी मौत का कारण बन गया।शनिवार की शाम 5 बजे वेंटीलेटर के साथ तुम्हें डायलिसिस पर भी रखा गया पर चिकित्सकों के सारे प्रयासों को धता बता कर तुम विदा हो गए।रविवार की दोपहर उसी ग्वालियर में तुम्हारा अंतिम संस्कार होगा जो हमारी जन्मभूमि भी है और जिसने जिंदगी को सवांरने का जरूरी काम भी किया था।बेटी डॉ सेजल और पुत्र कुश की टूटती आवाज को मेरा क्रंदन क्या दिलाशा दे पाता?हम लगातार अच्छी खबर का सिर्फ इंतजार ही करते रहे।
बिडम्बना का यह कैसा चेहरा है जिसमें सब कुछ काला,कलुषित और कलंकित है?मन अशान्त और दिल जार जार रो रहा है।तुम मेरे दोस्त ही नहीं उस पारिवारिक स्वजन की तरह थे जो मेरी हर छोटी बड़ी तकलीफ को पलक झपकते हल करते थे अपनी अत्यंत विनम्र और आत्मीय मुस्कान के साथ।वह देश के किसी भी हिस्से में जाना हो,वहाँ रुकना हो या कैसा भी दुर्लभ काम हो -शरद के मायने सब कुछ सहज और सरल था।जब से ग्वालियर छोड़ा तब से तुम्हारी अंतिम सांस तक कम से कम मुझे तो यह पक्का यकीन था कि बुरे और कठिन दौर में सब साथ छोड़ देंगे पर चट्टान की तरह यदि कोई पीछे खड़ा रहेगा अडिग,अचल तो वह शरद श्रीवास्तव ही होगा।आज उस विश्वास की मौत हुई है।भरभराकर गिरा है वह सच जिस पर मुझे नाज था।
वह साल 1979 था।अंधेरा उतर रहा था।जयेंद्र गंज स्थित दैनिक ‘स्वदेश’ के कार्यालय में एक पतले दुबले,सांवले रंग वाले लड़के से आलोक तोमर ने मिलवाया,’हरिज्जि यह शरद श्रीवास्तव हैं मेरे नये मकान मालिक।’तुम मिले तो आलोक तोमर के मकान मालिक के तौर पर,पर तुमने कब्जा किया मेरे मन और दिल पर।तुम्हारा घर D 11,गांधी नगर,ग्वालियर में दोस्तों के बीच एक ऐसा उत्सव घर बन गया जो दोस्तों की मदद को सदा आतुर रहता।वह विशाल घर,सदाशयता और सहृदयता में भी आगे रहा।1980 के आसपास पहले मैं फिर दो साल बाद आलोक दिल्ली पहुँच गया।ग्वालियर से हमारे रिश्ते तनिक कमजोर हुए पर तुमने हमें यह अहसास ही नहीं होने दिया कि हम बाहर हैं।
तुम्हारा एक ऐसा जुड़ाव मेरे साथ हर पल रहा कि मैं मुम्बई रहूँ या किसी और शहर में मेरा एक फोन भर, हर समस्या का निदान कर देता था।बाद में यह तुम्हारी पहचान ही बन गयी।इस पहचान ने तुम्हारे व्यापार को,सम्पर्कों को बलवान बनाया।हम लकदक विश्वास के साथ किसी को भी तुम्हारा नम्बर दे सकते थे और ग्वालियर हो या भोपाल या कोई और शहर यह हुआ ही नहीं कि हमारा वह विश्वास टूटा हो।
तुम्हारे अपने व्यवहार से बहुत व्यापक हो गए तुम्हारे सम्पर्क।वे उदयन शर्मा हो या राहुल देव या प्रदीप सिंह।एल के जोशी हो या विजय सिंह।मोतीलाल वोरा हो या अर्जुन सिंह।किसी भी समाज का,किसी भी पार्टी का,किसी भी गुट का व्यक्ति हो- तुम्हारे रिश्ते सबसे मधुर रहे हैं।तुम उनसे भी मधुरता निभा गये जो मित्र द्रोह के प्रतीक बन गए थे।
आज हम सब स्तब्ध हैं।हमारी स्तब्धता का कारण सिर्फ एक है -अब कहाँ मिलेगा वह दूसरा शरद श्रीवास्तव जो दुर्लभ को सरल और असहज को सहज बना देता था।असामान्य है किसी में इस खूबी का होना।आज अशोक सिंह हो,अजीत भास्कर हो,सुरेंद्र शर्मा उर्फ सरपंच,अरुण तोमर,देव श्रीमाली,रवींद्र झारखरिया या कोई और भरे मन से सब यही दुआ कर रहै हैं कि फिर फिर तुम हम सब के ही बीच आना।तुम्हारी यादें हम फिलहाल सुरक्षित रख रहे हैं।आज दोपहर ग्वालियर में तुम कायदे से तो धुआँ धुआँ हो जाओगे पर कभी भी नहीँ मिटोगे उन मनों से जो अरसे तक तुम्हें बड़े जतन से सहेज कर रखेंगे।
मेरी क्या हैसियत की तुम्हें अलविदा कहूँ?
शरद श्रीवास्तव सिर्फ अदृश्य होते हैं वे जाते कहीं नहीं हैं।
यही मेरा यकीन है और मैं आजन्म इस पर कायम भी रहूंगा।
(लेखक ख्यातिनाम पत्रकार ,लेखक हैं )

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