Bundelkhand Water Crisis: बुंदेलखंड तेरी यही कहानी! अनाज ढोने वाली बैलगाड़ी…केन नदी से लाद रही पीने का पानी

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हमीरपुर:रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून…ये कहावत तो आपने बहुत बार सुनी होगी। बुंदेलखंड का इलाका पानी के संकट से बार-बार हल्कान होता है लेकिन हुक्मरानों को शायद फर्क नहीं पड़ता। तमाम पेयजल योजनाएं कागजों पर दौड़ती हैं लेकिन हकीकत की जमीन प्यासी ही रह जाती है। जी हां, हम बात कर रहे हैं हमीरपुर जिले की। यहां बीहड़ के आधा दर्जन गांवों में पीने के पानी का संकट गहरा गया है। कई करोड़ की लागत वाली पेयजल योजनाएं भी ग्रामीणों के लिए एक मजाक बनकर रह गई हैं। इसीलिये इन गांवों के लोग केन नदी से बैलगाड़ी में पानी ढोने को मजबूर हैं।
आधा दर्जन गांवों का जलसंकट गहराया
जिले का मौदहा तहसील क्षेत्र पड़ोसी जिले बांदा की सीमा से जुड़ा है। इस क्षेत्र में आधा दर्जन से अधिक गांवों में गर्मी का पारा चढ़ते ही पानी का संकट गहरा गया है। करीब चार दशक पहले केन नदी के बीहड़ इलाकों में बसे छानी, बक्छा, गुसियारी, रतवा, फत्तेपुर, इचौली, नायकपुरवा, और कपसा सहित दूसरे गांवों के बाशिन्दों की प्यास बुझाने के लिये विश्व बैंक की मदद से एक प्रोजेक्ट आया। केन नदी के भूरागढ़ के पास कई करोड़ की लागत से एक ग्राम समूह पेयजल योजना तैयार कराई गयी थी लेकिन ये जमीन पर आते ही धड़ाम हो गयी है। अब जब गर्मी का पारा दिनोंदिन चढ़ रहा है तब इन सभी गांवों में पानी के लिये लोगों में जद्दोजहद मच गई है।
बैलगाड़ी से कई किमी चलकर ला रहे केन का पानी
खेती किसानी के बाद अब गांव के लोग बैलगाड़ी से केन नदी और कई किमी दूर से पीने का पानी ढो रहे हैं। बीहड़ में बसे भवानी गांव निवासी और शिवसेना नेता महंत रतन ब्रह्मचारी ने बताया कि बक्छा, छानी समेत कई गांवों में इन दिनों पानी के लिए लोग परेशान हैं। प्यास बुझाने के लिए ग्रामीण केन नदी और जंगल में स्थित प्राचीन कुएं से बैलगाड़ी के जरिए पानी ढोने में जुटे हैं। गांव के लोग ड्रमों में पानी भरकर बैलगाड़ी पर लादते हैं। इसके बाद घरों में इस पानी को इकट्ठा करते हैं। फिर इसी पानी का इस्तेमाल पूरे परिवार के लोग पीने और दूसरे घरेलू काम के लिए करते हैं।
क्यों नहीं सफल हो रहीं पेयजल परियोजनाएं
कपसा गांव के पूर्व प्रधान जगराम सिंह ने बताया कि गांव में पानी का संकट विकट है। लोग कई किलोमीटर दूर कुएं या नदी से बैलगाड़ी और साइकिल के जरिए पानी ढोकर घर लाने को विवश हैं। भौगोलिक वजहों से गांव में मीठा पानी नहीं है। इसीलिये पेयजल योजनायें भी सफल नहीं हैं। बता दें कि कपसा गांव की आबादी 2000 है। वहीं सिजवाही में 3400, छानी में 2100, बक्छा में 1900, गुसियारी में 3100, रतवा में 2300 की आबादी है। वहीं नायकपुरवा और इचौली में तकरीबन सात हजार लोग रहते हैं।
15 दिन बाद गांवों में पानी के लिए मचेगी त्राहि-त्राहि
कपसा गांव के पूर्व सरपंच चन्द्रभान सिंह ने बताया कि अधिकारी पेयजल योजनाओं को लेकर तेजी नहीं दिखा रहे है। गांव में पानी की टंकी बन चुकी है लेकिन इसे पाइपलाइन से जोड़कर नहीं चालू कराया जा रहा है। दो किमी पाइप लाइन डलवाने के लिये भी इंजिनियर रुचि नहीं ले रहे हैं। बताया कि यदि पेयजल योजना के अधूरे कार्य पूरे कराकर इसे पन्द्रह दिनों में नहीं चालू कराया गया तो पीने के पानी की समस्या विकराल हो जायेगी। बताया कि कई इलाकों में लोग बैलगाड़ी से पीने का पानी अब ढोने लगे हैं।
1392.12 लाख लागत से कई पेयजल योजनाएं
जलनिगम के इंजिनियर रामरतन ने बताया कि कपसा गांव में मार्च 2018 में 305.86 लाख रुपये की पेयजल योजना को मंजूरी मिली थी। योजना का काम शुरू कराने के लिये 122.34 लाख रुपये की धनराशि जारी की गई थी। गांव में नलकूपों के बोर फेल होने पर इस योजना के दो नलकूप सिजवाही गांव में बनाए गए हैं। कपसा में पानी की टंकी का निर्माण 90 प्रतिशत तक पूर्ण कराया गया है। तीन किमी लम्बी पाइपलाइन भी डलवायी गयी है। अभी 2 किमी पाइपलाइन पड़नी बाकी है।
ढाई साल बीतने के बाद भी नहीं पूरी हो सकीं पेयजल योजनायें
गुसियारी गांव में भी 486.36 लाख रुपये की लागत की पेयजल योजना का काम चल रहा है। अब तक 194.54 लाख रुपये की धनराशि खर्च हो गई है। दो नलकूपों के अलावा पानी की टंकी का काम 90 प्रतिशत तक पूरा कराया जा चुका है। साढ़े तीन किमी तक पाइपलाइन पड़ चुकी है। स्टाफ क्वॉर्टर के निर्माण भी पूरे हो चुके हैं। पांच करोड़ की लागत से नायकपुरवा में पेयजल योजना का काम अंतिम दौर में है। 4 नलकूप और पीडब्ल्यूआर के काम पूरे हो चुके हैं। योजना से जलापूर्ति भी कराई गई है।
कई गांवों के हजारों बाशिन्दे मजबूरी में पी रहे खारा पानी
बताया जाता है कि बीहड़ इलाके में बसे खैर, छानी और बक्छा गांव में हजारों लोग फ्लोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर हैं। इन गांवों में सरकारी तौर पर प्रयास तो किए गए लेकिन गांवों के अंदर मीठा पानी नहीं है। जलनिगम के इंजिनियर रामरतन का कहना है कि कई बार तीनों गांवों में मीठे पानी के लिये बोर कराए गए लेकिन खारा पानी ही जांच में मिला। इन गांवों के हजारों लोग कई किमी दूर एक पुराने कुएं से प्यास बुझा रहे है। सुबह से लेकर शाम तक कुएं पर भी गांव वालों की लाइन लगी रहती है।
भारतीय ग्रामीण पेयजल मिशन से संकटग्रस्त गांवों को पानी
लघु सिंचाई विभाग के एग्जिक्यूटिव इंजिनियर एसपी राम ने बताया कि भारतीय ग्रामीण पेयजल एवं स्वच्छता मिशन के तहत जिले के सभी ब्लॉकों के गांवों में जलापूर्ति कराए जाने के लिए 2.89 अरब रुपये की एक बड़ी परियोजना को मंजूरी मिली है। परियोजना का काम पीएनसी आगरा करायएगी। प्रोजेक्ट में हरौलीपुर गांव के पास यमुना नदी में वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाया जाएगा। वहीं दूसरा ट्रीटमेंट प्लांट सुमेरपुर क्षेत्र के पत्योरा गांव में यमुना नदी के किनारे बनेगा। यह परियोजना ग्रामीणों के लिये वरदान साबित हो सकती है।

source:NBT

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