सात घंटे की बैठक, MSP ना छूने का आश्वासन…फिर भी ठंड में सड़क पर बैठे किसान मानने को राजी क्यों नहीं?

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नई दिल्ली:कड़ाके की ठंड के बीच सड़कों पर बैठे किसान, राह किनारे बनता भोजन और दिल्ली में चलती चर्चाएं…राजधानी के लुटियंस जोन से लेकर स्टेट बॉर्डर तक किसानों का जमावड़ा बढ़ने लगा है। राज्यों के संगठन आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं और कुछ ने चेतावनी भी दी है। इस बीच दिल्ली में केंद्र की मोदी सरकार ने भले ही किसानों से बातचीत में ये कह दिया है कि वो न्यूनतम समर्थन मूल्य को छूने भी नहीं जा रही, लेकिन तमाम मौखिक आश्वासनों के बीच रास्तों पर धरना दे रहे किसान मानने को तैयार नहीं हैं। बातों के बीच का पेच सरकार और किसानों के उस सख्त रुख पर फंस गया है, जिसमें सरकार ने पूरे कानून को वापस लेने के मूड में दिख रही, ना किसान बिलों की वापसी तक रास्तों से हटने में। सब के बीच जनता है जो कि जाम में फंसने से लेकर महंगी सब्जियों को खाने तक में कहीं मजबूर दिख रही है। सियासी हालातों के बीच गुरुवार को दिल्ली के विज्ञान भवन में किसान और सरकार के प्रतिनिधि सात घंटे की बैठक कर चुके हैं।
सरकारी बैठक में भले ही रास्ता निकलता ना दिखा हो लेकिन केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने एक बार फिर कहा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को कभी छुआ भी नहीं जाएगा। केंद्र की सरकार और किसान संगठनों के बीच दिल्ली के विज्ञान भवन में हुई चर्चा के बाद नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य के अनुसार, फसलों की खरीद की व्यवस्था बरकरार रहेगी और इस प्रावधान को कोई भी नहीं छुएगा। हालांकि सरकार के इस आश्वासन के बावजूद किसानों से बातचीत में कोई रास्ता निकलता नहीं दिख रहा है। किसानों का कहना है कि सरकार के सामने बात कृषि कानूनों की वापसी के लिए रखी जा रही है, लेकिन सरकार सिर्फ एमएसपी के बारे में बात कर रही है।
सात घंटे की बैठक..पर हालात वैसे ही
इससे पहले दिल्ली के विज्ञान भवन में किसान नेताओं और सरकार के बीच करीब साढ़े सात घंटे तक बैठक चली। बैठक कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बैठक में किसान नेताओं से कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price) को नहीं छुआ जाएगा, एमएसपी (MSP) में कोई बदलाव नहीं होगा। किसानों के साथ बैठक के बाद कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने कहा कि किसानों और सरकार ने अपने-अपने पक्ष रखे। हम लोग शुरू से ही बात कह रहे थे कि भारत सरकार को किसानों की पूरी चिंता है। सरकार को कोई अहंकार नहीं है। हम खुले मन से किसानों के साथ बातचीत कर रहे हैं। किसानों को चिंता है कि नए कानून से मंडी खत्म हो जाएगी। भारत सरकार यह विचार करेगी कि सशक्त हो और इसका उपयोग और बढ़े।
बात सकारात्मक, लेकिन बिल वापसी से कम कुछ नहीं: BKU
वहीं किसान संगठन सरकार के तमाम आश्वासनों के बावजूद अपनी मांग पर अड़े हैं। किसानों का कहना है कि प्रदर्शनों का मुद्दा कृषि बिलों को पूरी तरह से वापस लेना है। भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत का कहना है कि किसान कानूनों को वापस कराना चाहते हैं, लेकिन सरकार सिर्फ एमएसपी की बात कर रही है और कानूनों में संशोधन तक ही चर्चा करना चाहती है। केंद्र सरकार ने एमएसपी पर संकेत दिए हैं। ऐसा लगता है कि एमएसपी को लेकर उनका रुख ठीक रहेगा। वार्ता ने थोड़ी प्रगति की है।
किसान और सरकार आखिर कहां पर अड़े हैं?
मुख्य मामला किसान बिलों की वापसी और सरकार के रुख पर टिका है। भले ही सरकार ने प्राइवेट मंडियों से लेकर एमएसपी तक पर किसानों को मौखिक आश्वासन देने तक की बात कही है, लेकिन किसान सब के बावजूद कानूनों की वापसी के रुख पर अड़े हैं। दिल्ली में जिस तरह से गतिरोध की स्थिति बनी है, उसे देखकर ये कहा जा सकता है कि अगले कुछ दिनों में अगर कुछ मध्य का रास्ता नहीं निकला तो स्थितियां गंभीर होंगी। ट्रांसपोर्ट यूनियन से लेकर राज्यों के किसान संगठनों के समर्थन देने के ऐलान के बीच सरकार और किसानों के बीच बातचीत का एक और दौर शुरू करने का प्लान भी बनने लगा है। प्रशासन से लेकर बीजेपी नेतृत्व तक के लोग इस मामले में किसानों के बीच रास्ता बनाने में जुटे हैं, हालांकि किसान संगठनों का कहना है कि उन्हें कानूनों की वापसी से कम कुछ भी स्वीकार नहीं है।

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