चार नवंबर को करवा चौथ का व्रत, सुहागिनें रखेंगी दिनभर निर्जल निराहार व्रत

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अलीगढ़। करवाचौथ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है करवा यानी मिट्टी का बरतन और चौथ यानि चतुर्थी। इस त्योहार पर मिट्टी के बरतन यानी करवे का विशेष महत्व माना गया है। करवा पति-पत्नी के बीच प्यार और स्नेह का प्रतीक माना जाता है।
बस एक दिन और बीच में, फिर निकलेगा करवा का चांद। वो चांद जिसे देखने के लिए सुहागिन महिलाएं सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक रखेंगी निर्जल निराहार व्रत। वैवाहिक जीवन को प्रेम की चाशनी से सराबोर करते इस दिन का आधार श्रद्धा और विश्वास है। इसके अलावा इस दिन किए जाने वाला हर कार्य धार्मिक मान्यता के साथ वैज्ञानिक आधार भी लिये हुए है।
ज्योतिषाचार्य पं. आदित्य नाराण अवस्थी के अनुसार रामचरित मानस के लंका कांड के अनुसार, जिस समय भगवान श्रीराम समुद्र पार कर लंका में स्थित सुमेर पर्वत पर उतरे और श्रीराम ने पूर्व दिशा की ओर चमकते हुए चंद्रमा को देखा तो अपने साथियों से पूछा कि चंद्रमा में जो कालापन है, वह क्या है? सभी ने अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार जवाब दिया। किसी ने कहा चंद्रमा में पृथ्वी की छाया दिखाई देती है। किसी ने कहा राहु की मार के कारण चंद्रमा में कालापन है तो किसी ने कहा कि आकाश की काली छाया उसमें दिखाई देती है। तब भगवान श्रीराम ने कहा कि विष यानी जहर चंद्रमा का बहुत प्यारा भाई है (क्योंकि चंद्रमा व विष समुद्र मंथन से निकले थे)। इसीलिए उसने विष को अपने हृदय में स्थान दे रखा है, जिसके कारण चंद्रमा में कालापन दिखाई देता है। अपनी विषयुक्त किरणों को फैलाकर वह वियोगी नर-नारियों को जलाता रहता है। इस पूरे प्रसंग का मनोवैज्ञानिक पक्ष यह है कि जो पति-पत्नी किसी कारणवश एक- दूसरे से बिछड़ जाते हैं, चंद्रमा की विषयुक्त किरणें उन्हें अधिक कष्ट पहुंचाती हैं। इसलिए करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा कर महिलाएं ये कामना करती हैं कि किसी भी कारण उन्हें अपने प्रियतम का वियोग न सहना पड़े।
क्या है सरगी की परंपरा
करवा चौथ का त्यौहार सरगी के साथ आरम्भ होता है। यह करवा चौथ के दिन सूर्योदय से पहले किया जाने वाला भोजन होता है। जो महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं उनकी सास उनके लिए सरगी बनाती हैं। शाम को सभी महिलाएं श्रृंगार करके एकत्रित होती हैं और फेरी की रस्म करती हैं। इस रस्म में महिलाएं एक घेरा बनाकर बैठती हैं और पूजा की थाली एक दूसरे को देकर पूरे घेरे में घुमाती हैं। इस रस्म के दौरान एक बुजुर्ग महिला करवा चौथ की कथा गाती हैं। भारत के अन्य प्रदेश जैसे उत्तर प्रदेश और राजस्थान में गौर माता की पूजा की जाती है। गौर माता की पूजा के लिए प्रतिमा गाय के गोबर से बनाई जाती है।
छलनी से ही चंद्र दर्शन
करवाचौथ के चंद्रमा का दर्शन स्त्रियां छलनी में से करती हैं। इसके पीछे मान्यता है कि जितने ज्यादा चंद्र दर्शन उतने लंबी पति की आयु होती है। छलनी में सैंकड़ों छिद्र होते हैं। इसलिये स्त्रियां छलनी में से चंद्र दर्शन कर अपने पति की लंबी आयु की कामना करती हैं।
करवा का महत्व
करवाचौथ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, करवा यानी मिट्टी का बरतन और चौथ यानि चतुर्थी। इस त्योहार पर मिट्टी के बरतन यानी करवे का विशेष महत्व माना गया है। करवा पति-पत्नी के बीच प्यार और स्नेह का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि करवाचौथ पर करवे का विशेष महत्व है। कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष में चंद्रदेव के साथ-साथ भगवान शिव, देवी पार्वती और कार्तिकेय की भी पूजा की जाती है। माना जाता है कि अगर इन सभी की पूजा की जाए तो माता पार्वती के आशीर्वाद से जीवन में सभी प्रकार के सुख मिलते हैं।
सोलह श्रृंगार का महत्व
करवाचौथ के दिन विवाहित स्त्रियां सुंदर कपड़े, गहने पहन कर सोलह श्रृंगार करती हैं और चंद्रमा की पूजा करती हैं। यह सत्य है कि स्त्रियों को सुंदर कपड़ों और गहनों से विशेष लगाव होता है। हिन्दू परंपराओं के अनुसार श्रृंगार की बहुत-सी चीजें केवल स्त्री के रूप को नहीं निखारती बल्कि उसपर सकारात्मक प्रभाव भी डालती हैं। श्रृंगार की कुछ वस्तुएं जैसे नथनी, सिंदूर, बिंदी, चूडियां आदि उसके विवाहित होने का संकेत देती हैं।
निराहार ही क्यों
भोजन पचाने में प्राणऊर्जा यदि खर्च होती है। ऐसे में आध्यात्मिक ऊर्जा के संग्रह में बाधा उतपन्न होती है। अन्न को पचाने में 90 फीसद प्राण ऊर्जा खर्च हो जाती है। अतरू क्योंकि इस दिन सर्वाधिक तपशक्ति अर्जन करने की आवश्यकता होती है, इसलिए अन्न का त्याग किया जाता है।
जल पिलाने और मीठा खिलाने का क्या है अर्थ
स्त्री के प्रति प्रेम और अपने उत्तरदायित्य हो वहन करने का संकल्प है, कि आजीवन हम तुम्हें जल जैसा शीतल प्रेम देंगे और मिठाई जैसा तुम्हारा जीवन मधुर रखेंगे। तुम्हारा ख्याल रखेंगे।

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