नरेंद्र सिंह तोमर :घनीभूत पीड़ा के पार्श्व में एक मोम सा हृदय

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भाई नरेन्द्र सिंह तोमर उपाख्य “मुन्ना भैया” वर्तमान भारतीय राजनीति के उन गंभीर राजनेताओं में से हैं जो बोलते तो कम हैं पर काम अधिक करते हैं. सौम्यता उनकी सहचरी है तो आत्मिक संलाप उनका अलंकार और अहंकार तो उनकी देहरी पर फटकने भी नहीं पाता. उन्हें ये संस्कार विरासत में मिले. पारिवारिक दायित्वों से उन्होंने कभी मुख नहीं मोड़ा. लेकिन हम उनके कुछ विगत वर्षों के पारिवारिक संत्रास और घनघोर बरसे दुःख के बादलों का संज्ञान लें तो लगता है कि आंतरिक टूट से ग्रसित यह व्यक्ति आखिर किस मिट्टी का बना है? जिसके स्वभाव में कोई विचलन तक नहीं है. पीड़ा के पहाड़ो के साथ सबक याद करने का यह विलक्षण उदाहरण है.
‘एक हृदय सैंकड़ों व्यथाएँ यही जन्मकुंडली हमारी ‘की उक्ति मुन्ना भैया पर सटीक बैठती है. 25 सितंबर 2011में पिताश्री स्व श्री मुन्शीसिंह जी का वरदहस्त ऊपर से उठा, तो 5 नवंबर 2014 को छोटी बहिन (श्रीमति मंजू सिंह “गुड्डी ” )के पति अर्थात बहनोई श्री अजयसिंह सिंह सिकरवार जी भी देवलोक गमन कर गये. पीड़ा के इस घनीभूत दौर से सुस्ताने भर का भी समय नहीं मिल पाया था कि 9 सितंबर 2019में माँ स्व श्रीमती शारदा देवी का भी साया सिर से उठ गया -और वे घर में सबसे बड़े हो गये. अवसाद, आंसुओं की लड़ियां और संत्रास के इस कठिनतम दौर में वे अपने को जैसे -तैसे सम्हाल भी नहीं पाये थे कि 18 जुलाई 2020 को उनके प्रिय अनुज मुन्नू भैया (स्व श्री अजयसिंह तोमर )भी असमय उनका साथ छोड़कर उस लोक को प्रस्थित हो गये जहाँ से लौटकर कोई आता नहीं.
इस तरह विगत वर्षों में पूरे परिवार के बिखराव की पीड़ा को अंतर्मन में समेटे हुये यह व्यक्ति आज भी गाम्भीर्य और शालीनता के प्रतीक के रूप में हमारे सम्मुख उपस्थित है. अल्पावधि में चार आत्मीय स्वजनों का चला जाना कोई छोटी बात…. नहीं -पर वे स्थितप्रज्ञ की भांति सब देखते रहे…. सहते भी रहे.
कहते हैं कि जो व्यक्ति जाता है वह थोड़ा -थोड़ा अंश सब में से ले जाता है और अपना थोड़ा अंश सबमें छोड़ भी जाता है….. शायद इसी को हम स्मृतियाँ कहते हैं.
‘दुःख ही जीवन की कथा रही
क्या कहूं गई जो नहीं कही ‘

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