आरक्षित सीटों पर कांग्रेस के टिकट तय, घोषणा बाकी

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-आधा दर्जन सीटों पर बसपा और भाजपा से आए नेता होंगे प्रत्याशी
भोपाल। प्रदेश में विधानसभा उपचुनाव को लेकर कांग्रेस और भाजपा रणनीत बनाने में जुटे हैं। भाजपा में जहां उपचुनाव को लेकर टिकट तय हैं, वहीं कांग्रेस में एक-एक सीट पर प्रत्याशियों की तलाश जारी है। 24 सीटों में से 10 सीट आरक्षित हैं। इनमें से 9 सीट अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं। आरक्षित सीटों पर कांग्रेस के प्रत्याशी लगभग तय हैं, लेकिन अभी घोषणा होना बाकी है। उपचुनाव से पहले कई बसपा नेता कांग्रेस और कई कांग्रेस नेता भाजपा में शामिल हो सकते हैं।
पिछले एक महीने के भीतर कांगे्रस ने ग्वालियर-चंबल में बसपा नेताओं को तोड़ा है। बसपा नेता प्रागी लाल जाटव सहित दो दर्जन से अधिक नेताओं ने मायावती का साथ छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है। जाटव पहले शिवपुरी के करैरा निर्वाचन क्षेत्र से विधानसभा चुनाव लड़े थे और तीसरे नंबर पर रहे थे। इसके अलावा डबरा नगरपालिका की पूर्व अध्यक्ष सत्य प्रकाशी पटसेरिया बीएसपी कार्यकर्ताओं के साथ कांग्रेस में शामिल हो चुकी हैं। ये दोनों नेता ग्वालियर-चंबल इलाके में बसपा का बड़ा चेहरा माने जाते थे। इससे पहले बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार पूर्व विधायक सत्यप्रकाश और पूर्व सांसद देवराज सिंह पटेल कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं।
इन सीटों पर प्रत्याशी लभगत तय
दतिया जिले की भांडेर सीट से फूलसिंह बरैया कांग्रेस प्रत्याशी हो सकते हैं। कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव में उन्हें प्रत्याशी बनाया था, लेकिन कांंग्रेस के बाद विधायकों की संख्या कम होने की वजह से वे चुनाव हार गए। डबरा सीटा से सत्यप्रकाशी पटसेरिया कांग्रेस प्रत्याशी हो सकती हैं। वे पिछले महीने ही बसपा छोड़कर कांग्रेस में आई हैं। प्रागीलाल जाटव को करैरा से प्रत्याशी बनाया जा सकता है। प्रदीप अहिरवार, पूर्व सांसद देवराज सिंह पटेल को भी उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी बनाया जा सकता है। इधर भाजपा छोड़कर कांग्रेस में वापस आए प्रेमचंद्र गुड्डू को सांवर विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाया जा सकता है।
कांग्रेस ने बसपा के जनाधार वाले नेताओं को तोड़ा
ग्वालियर-चंबल संभाग के तहत आने वाली सीटों पर बसपा को अच्छा खासा वोट मिलता रहा है। पिछले चुनाव में 15 सीटों पर उसे निर्णायक वोट मिले थे। इनमें से दो सीटों पर बसपा प्रदेश में दूसरे नंबर पर रही थी जबकि 13 सीटें ऐसी थीं, जहां बसपा प्रत्याशियों को 15 हजार से लेकर 40 हजार तक वोट मिले थे। ग्वालियर-चंबल की जिन सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं, उनमें से मेहगांव, जौरा, सुमावली, मुरैना, दिमनी, अंबाह, भांडेर, करैरा और अशोकनगर सीट पर बसपा पूर्व के चुनाव में जीत दर्ज कर चुकी है।

इन सीटों पर मजबूत है बसपा
2018 के विधानसभा चुनाव में गोहद, डबरा और पोहरी में बसपा दूसरे नंबर पर रही है। जबकि ग्वालियर, ग्वालियर पूर्व और मुंगावली में उसकी मौजूदगी नतीजों को प्रभावित करने वाली साबित हुई. मुरैना में बीजेपी की पराजय में बसपा की मौजूदगी प्रमुख कारण था। इसके अलावा पोहरी, जौरा, अंबाह में बसपा के चलते भाजपा तीसरे नंबर पर पहुंच गई थी। 2018 के चुनाव में बसपा को अंबाह में 22179, अशोकनगर में 9559, करैरा में 40026, ग्वालियर में 4596, ग्वालियर पूर्व में 5446, गोहद में 15477, डबरा में 13155, दिमनी में 14458, पोहरी में 52736, भांडेर में 2634, मुंगावली में 14202, मुरैना में 21149, मेहगांव में 7579, बमोरी में 7176, सुमावली में 31331 एवं जौरा में 41014 वोट मिले थे।

दलितों को अपने साथ रखने की कोशिश
सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी एक्ट को लेकर दिए गए फैसले के विरोध में दलित संगठनों ने 2 अप्रैल 2018 को भारत बंद किया था। भारत बंद के दौरान ग्वालियर-चंबल इलाके में हिंसा भड़क गई थी, जिसमें कई लोगों की जान चली गई थी और काफी लोगों पर एफआईआर दर्ज हुई थी। उस समय मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार थी, जिससे दलित समुदाय काफी नाराज थी और चुनाव में उसका फायदा कांग्रेस को मिला था। 2018 विधानसभा में दलित की पहली पसंद कांग्रेस बनी थी और इसी के सहारे चंबल-ग्वालियर इलाके में बीजेपी का पूरी तरह सफाया हो गया था। दलित समुदाय का कहना है कि कांग्रेस सत्ता में आने के बाद उनके मुद्दों को भूल गई, 15 महीने सत्ता में रहने के दौरान कमलनाथ सरकार ने 2 अप्रैल को दलितों पर दर्ज मुकदमे वापस नहीं लिए। हालांकि, इस दिशा में कमलनाथ ने कदम जब बढ़ाया तो सरकार चली गई और दलितों के मुकदमे वापस नहीं हो सके। ऐसे में बसपा उपचुनाव में इसे एक बड़ा मुद्दा बनाकर अपने कोर दलित वोट बैंक को साधने में जुटी है। ऐसे में कांग्रेस की नजर बसपा नेताओं पर है, जिनके दम पर सत्ता में वापसी का सपना देख रही है।

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