किक्रेट हीं नहीं भारत के कई खेलों में लगा हैं चीनी कंपनियों का पैसा

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फिटनेस उपकरणों के मामले में चीन की मार्केट सबसे मजबूत
नई दिल्ली । भारत-चीन विवाद के बाद चीनी मोबाइल कंपनी वीवो से आई.पी.एल. की टाइटल स्पांसरशिप वापस लेने की मांग उठ रही है। यदि यहां होता हैं तब आईपीएल के अलावा भारत के अन्य खेल भी मुश्किल में पड़ सकते है। दरअसल, भारत के कई खेलों में चीनी कंपनियों का पैसा लगा है। सबसे ज्यादा मुश्किल बीसीसीआई को पेश आएगी। भारतीय क्रिकेट की स्पांसरशिप में बड़ी हिस्सेदारी चीनी कंपनियों की है।

चीनी कंपनी वीवो ने आईपीएल की टाइटल स्पांसरशिप के लिए बी.सी.सी.आई. से 5 साल के 2199 करोड़ रुपए की डील की है।डील के अनुसार वीवो हर साल 440 करोड़ रुपए बी.सी.सी.आई. को देता है। इसके बाद 2 अन्य इनवैस्टर्स पेटीएम और ड्रीम-11 हैं। पेटीएम भारत के इंटरनैशनल और घरेलू क्रिकेट मैचों की स्पांसर है।पेटीएम में चीनी कंपनी अली बाबा ने 600 मिलियन डॉलर लगा रहे हैं।
वहीं, ड्रीम-11 में चीनी कंपनी टेनसैंट ने 100 मिलियन डॉलर का निवेश किया है। ड्रीम-11 आई.पी.एल. का भी ऑफिशियल पार्टनर हैं। अगर आई.पी.एल. से 3 बड़े स्पांसरशिप अलग होते हैं तब बी.सी.सी.आई. के लिए तगड़ा झटका होगा। तगड़ा इसकारण क्योंकि कोविड-19 के कारण जो विश्व बाजार में मंदी फैली है, उसके कारण नया स्पांसर ढूंढना मुश्किल हो जाएगा। चीन बैडमिंटन, टैनिस और फिटनेस उपकरणों की मार्केट पर भी कब्जा जमा चुका है। चीन पहले फुटबॉल और बास्केटबॉल का रॉ मैटेरियल देता था। अब यह प्रोडक्ट फीनिशिंग के साथ आ रहे हैं। अकेला आई.पी.एल. प्रबंधन ही नहीं जिमनास्ट ली निंग भी बायकॉट से तगड़ा झटका खा सकते हैं। ओलिम्पिक में 3 गोल्ड सहित 6 पदक पाने वाले ली निंग उसी ली निंग कंपनी के मालिक है जोकि इंडियन ओलिम्पिक एसोसिएशन से भारतीय प्लेयरों को स्पॉन्सर करने की डील कर चुकी है। ली निंग चर्चा में तब आए थे जब उन्होंने बैडमिंटन प्लेयर पी.वी. सिंधु के साथ रिकॉर्ड 48 करोड़ में करार किया था। भारतीय बैडमिंटन इतिहास में यह अब तक की सबसे बड़ी डील है। अब भारत-चीन गलवान विवाद के बाद ली निंग के साथ डील टूटने का खतरा बढ़ गया है। इससे ली निंग का कम बल्कि इंडियन ओलिम्पिक एसोसिएशन को ज्यादा नुकसान होगा।
आई.ओ.ए. जनरल सैक्रेटरी राजीव मेहता ने कहा टेनसैंट ने सबसे ज्यादा बोली लगाकर स्पॉन्सरशिप ली थी। हमें सरकार की तरफ से इस करार को रद्द करने की कोई सूचना नहीं आई है। अगर ऐसा होता हैं तब भारतीय खेल सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले है। पिछले 5 साल में चाइनीज कंपनियों में भारत की स्पोटर्स मार्केट पर 80 फीसदी कब्जा कर लिया है। मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के आंकड़े के अनुसार भारत-चीन में 2018-19 में करीब 107 लाख करोड़ का व्यापार हुआ। जानकार बताते हैं अगर चाइनीज प्रोडक्ट पर बैन लगाना है,तब इसके लिए भी कई साल लग जाएंगे। सबसे पहले भारत को अपना इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना होगा जोकि कम कीमत में ज्यादा और क्वलिटी वाला प्रोडक्शन कर सके।
फिटनेस उपकरणों के मामले में चीन की मार्केट सबसे मजबूत है। इंटरनैशनल जिम्रास्टिक फैडरेशन के माणकों के अनुसार चीनी कंपनी सबसे सस्ते फिटनैस उपकरण मुहैया करवा देती है। उदाहरण के लिए अगर जिम्रास्टिक के एक सैट के लिए जर्मन और फ्रांस की कंपनियां दो करोड़ रुपए लेती हैं,वहीं की कंपनी एक करोड़ में ही सबकुछ तैयार कर दे देती है। टीम इंडिया की अभी स्पांसरशिप भारतीय लॄनग एप ‘बायजू’ के पास है। बायजू की शुरुआत केरला में जन्मे बायजू रवेंद्रन ने की थी। ‘बायजू’ में चीनी कंपनी का पैसा लगा हुआ है। टेनसैंट ने 2017 में 40 मिलियन डॉलर ‘बायजू’ में इन्वैस्ट किया था। इसके बाद मार्च 2019 में फिर से पैसे लगाए। अब सवाल उठता है कि चीनी कंपनियों का बहिष्कार करने से बायजू जैसे कंपनियां टिक पाएंगी या नहीं। भले ही बायजू को कोई अन्य इंडियन स्पांसर मिल जाए लेकिन वह उन्हें इतना पैसा नहीं दे पाएगा जितना चीनी कंपनी दे रही है। भारत के कई खेल हैं जिसे उभारने का श्रेय चीनी इन्वैस्टर्स को जाता है। इनमें से एक खेल प्रो-कबड्डी भी हैं। वीवो ने प्रो कबड्डी के 5 साल के स्पांसरशिप राइट्स के लिए 300 करोड़ की रकम चुकाई है।

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