सुप्रीम कोर्ट ने कहा- प्रवासी श्रमिकों से नहीं लिया जाए किराया, राज्य और रेलवे करें खाने की व्यवस्था

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नई दिल्ली। कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों के दुर्दशा पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रवासी श्रमिकों से कोई बस या ट्रेन का किराया नहीं लिया जाएगा। उन्हें राज्य द्वारा भोजन प्रदान किया जाना चाहिए। ट्रेनों में रेलवे द्वारा भोजन और पानी उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि पैदल घर जा रहे प्रवासी श्रमिकों को तुरंत आश्रय स्थलों पर ले जाया जाए और भोजन और सभी बुनियादी सुविधाएं प्रदान की जाएं। कोर्ट ने कहा कि वह अपने मूल स्थान पर पहुंचने के लिए प्रवासियों की कठिनाइयों से चिंतित हैं। उसने पंजीकरण, परिवहन और भोजन और पानी के प्रावधान की प्रक्रिया में कई खामियां पाई हैं। कोर्ट ने प्रवासी मजदूरों को दी जा रही मदद पर सभी राज्यों को शुक्रवार (5 जून) तक जवाब दाखिल कर ब्योरा देने को कहा। शुक्रवार को फिर सुनवाई होगी।
मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया
गौरतलब है कि प्रवासी मजदूरों के दुर्दशा के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है। जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे इन कामगारों की दयनीय स्थिति पर मंगलवार को केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया था। कोर्ट ने इन्हें 28 मई यानी आज जवाब देने के लिए आदेश जारी किया था। अदालत ने मामले पर सॉलिसिटर जनरल की सहायता भी मांगी थी।
मानवाधिकार कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने याचिका दायर की
मानवाधिकार कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने भी मजदूरों की हालत को लेकर याचिका दायर की है। अपनी याचिका में उन्होंने एक यूनिफॉर्म मंच बनाने के लिए एक दिशा-निर्देश की मांग की है, जिसका उपयोग सभी प्रवासियों द्वारा टिकट प्रणाली के लिए किया जा सके। याचिका में उपयुक्त सरकारों (केंद्र और राज्य सरकारों) और संबंधित अधिकारियों को पैदल घर लौट रहे प्रवासी कामगारों को आश्रय, भोजन और अन्य बुनियादी जरूरतें प्रदान करने के लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की है। पाटकर ने यह भी कहा कि इन प्रवासी मजदूरों को वित्तीय सहायता प्रदान की जानी चाहिए, साथ ही लॉकडाउन के बाद उनके रोजगार के लिए योजना भी शुरू की जानी चाहिए।

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