दलबदलू बंगला नंबर 38 की कहानी…मप्र की सियासत का केंद्र बिंदु है बंगला नंबर 38

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-एमपी की सत्ता में निभाता है अहम जिम्मेदारी

JITENDRAJITENDRA SHRIVASTAVA 
ग्वालियर।राजनीति में आपने नेताओं को दल बदलते देखा होगा, लेकिन ग्वालियर में एक ऐसा बंगला है, जो हमेशा दल बदलता रहता है। रेस कोर्स रोड पर बना बंगला नंबर 38 हमेशा प्रदेश की सियासत का केंद्र रहा है। 1977 से लेकर अब तक इसी बंगले में प्रदेश के सियासी मोहरों की चाल तय होती रही है, जो प्रदेश की राजनीति की दिशा और दशा तय करते थे। इतना ही नहीं इसी बंगले में कितने सूरमाओं का सियासी मुकद्दर भी लिखा गया है और यहीं से ये भी तय होता रहा है कि मध्यप्रदेश की सत्ता पर किसका राज होगा।
ग्वालियर में बना ये 38 नंबर का बंगला वैसे तो मध्य प्रदेश की सियासत में अहम किरदार निभाता है क्योंकि इस बंगले में कई पार्टियों के दिग्गज नेता रह चुके हैं। जो संभाग की राजनीति के साथ-साथ प्रदेश की राजनीति में अच्छा खासा वजूद रखते थे, सबसे पहले 1977 की बात कर लेते हैं। जब लोकदल पार्टी के कद्दावर नेता और प्रदेश अध्यक्ष रमाशंकर सिंह का ये बंगला सबसे मनपसंद बंगला माना जाता था। रमाशंकर उस समय लोक दल पार्टी के इकलौते विधायक थे, लेकिन अर्जुन सिंह की जब दूसरी बार सरकार बनी, तब लोक दल पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया और रमाशंकर सिंह अर्जुन सिंह के सबसे खास बन गए, उसके बाद इसी बंगले से मध्य प्रदेश की राजनीति में विरोधियों के लिए रणनीति तैयार करते थे।
रमाशंकर ने इसी बंगले से की थी सिंधिया परिवार की खिलाफ
जानकार बताते हैं कि मध्यप्रदेश में जब भी कुछ रणनीति तैयार होती थी तो इसी बंगले से होकर गुजरती थी। रमाशंकर सिंह तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के खास माने जाते थे। यही वजह थी कि रमाशंकर सिंह ने इसी बंगले से सिंधिया परिवार की खिलाफत शुरू कर दी क्योंकि अर्जुन सिंह और माधवराव सिंधिया एक दूसरे के धुर विरोधी थे। उसके बाद ये बंगला बीजेपी के पास पहुंच गया, फिर 15 साल तक इसी बंगले में बीजेपी का संभागीय संगठन कार्यालय संचालित हुआ।15 साल तक इसी बंगले में संघ और बीजेपी के नेताओं ने विरोधियों के खिलाफ रणनीति तैयार की।
अब पूर्व मंत्री प्रद्युम्न सिंह के पास है बंगला
इसी बंगले में संभाग के छोटे-बड़े चुनाव की रणनीति भी तैयारी की गई, बेशक ये बंगला बीजेपी के अलग-अलग विधायकों के नाम रहा हो, लेकिन इसमें 15 साल तक अघोषित संभागीय संगठन का कब्जा रहा। उसके बाद जब मध्यप्रदेश में कमलनाथ की सरकार आई तब इस बंगले को बीजेपी से खाली कराया गया और तत्कालीन मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने इस बंगले को अपने नाम अलॉट करा लिया। बंगला खाली करते वक्त बीजेपी के कई बड़े नेता काफी निराश हुए और कहा कि जब हमारी सरकार आएगी, तब हम इस बंगले में फिर आएंगे। अब संयोग से कांग्रेस से बीजेपी में पहुंचे प्रद्युम्न सिंह तोमर इसी बंगले में रहते हैं। अब ये तो तय है कि बंगला बीजेपी के पास तो रहेगा, लेकिन अब देखना होगा कि इस बंगले में फिर से बीजेपी की संगठन की राजनीति होती है या फिर महज एक नेता का घर बनकर रह जाएगा।
आपने कहा :
इस बंगले को लेकर पूर्व मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर का कहना है कि ये मेरा सौभाग्य है कि मुझे ये बंगला मिला है। मध्यप्रदेश में जब भी किसी की सरकार बनी है, तब ये बंगला सियासत का केंद्र बिंदु रहा है। वहीं कांग्रेस का कहना है कि ये बंगला एक तरह से सियासत का केंद्र रहा है। इस बंगले का इतिहास रहा है कि हमेशा इस बंगले से सत्ता के खिलाफ रणनीति तैयार हुई है और दल बदलू की कार्रवाई होती रही है। वरिष्ठ पत्रकार देवश्री माली का कहना है कि प्रदेश में इकलौता ऐसा बंगला है, जो हमेशा दल बदलता रहा है। सत्ता के साथ और सत्ता के खिलाफ ये बंगला हमेशा जाना जाता रहा है।

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