तो बसपा से मैदान में उतरेंगे चौधरी राकेश सिंह ?

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भोपाल।अजयभारत न्यूज
मध्यप्रदेश कांग्रेस की राजनीति में एक समय प्रदेश के रणनीतिकारों में गिने जाने वाले ग्वालियर-चम्बल के नेता चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी इन दिनों अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संर्घष कर रहे हैं। जब वह कांग्रेस में थे, तब दिग्विजय सिंह से पटरी मेल नही खाने के चलते प्रदेश की राजनीति में बड़ा उलटफेर करते भाजपा में आ तो गये पर यहाँ भी भाजपा के पुरोधा केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर को कोसते रहे । इसी कटुता के वश लोकसभा चुनाव के दौरान तो श्री तोमर के खिलाफ उनकी विषैली बयानबाजी का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब चर्चित हुआ था। अब जिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के जरिए कांग्रेस में गए थे वे ही मझधार में छोड़ भाजपा के हो लिए ।असमंजस के बाद अब यह लगभग स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस भी उनकी घर वापसी को तैयार नही है। अर्थात उनके राजनीतिक पुर्नवास की राह में एक के बाद एक बाधाएं जन्म ले रही हैं। हालांकि वह स्वयं इस बात का दावा करते हैं कि वह कांग्रेस में हैं ,जब तक किसी अधिकृत नेता का बयान नही आता।
इस पूरे मामले की तह में जाने के लिए हम आपको अतीत में लेकर चलते हैं। तो एक समय था जब मध्यप्रदेश की राजनीति में चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी को पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का खास माना जाता था, समय की बलिहारी साल 2008 के विधानसभा चुनाव के बाद सदन में जमुनादेवी को नेता प्रतिपक्ष चुना गया। लेकिन कुछ समय बाद ही उनका स्वास्थ्य खराब होने के कारण चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी को सदन में कांग्रेस विधायक दल का उप नेता होने के नाते प्रभारी नेता प्रतिपक्ष बनाया गया। इसी बीच नेता प्रतिपक्ष श्रीमती जमुना देवी का निधन हो गया। उनके निधन के बाद दोबारा नेता प्रतिपक्ष का चयन होना था और सदन में उप नेता और प्रभारी नेता प्रतिपक्ष होने के नाते कांग्रेस आलाकमान उन्हें ही नेता प्रतिपक्ष बनाने के पक्ष में था, लेकिन यहां पूर्व मुख्यमंत्री की कूटनीति ने उनसे यह अवसर छीन लिया और अजय सिंह को नेता प्रतिपक्ष चुना गया। यहीं से प्रदेश की राजनीति में चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी की राजनीतिक दिशा और दशा दोनों बदल गई।
चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी की माने तो अपमान के कई घूंट पीने के बाद अंततः साल 2013 में उनके सब्र ने जबाव दे दिया और सदन में उस समय जब नेता प्रतिपक्ष के रुप में अजय सिंह शिवराज सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए थे, उन्होंने कांग्रेस को अलविदा न केवल अलविदा कह दिया बल्कि भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। इसके एवज में साल 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उनके अनुज चौधरी मुकेश सिंह चतुर्वेदी को भिण्ड जिले की मेंहगांव विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया और वह विधायक बने। लेकिन चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी की माने तो भाजपा ने उन्हे राज्यसभा में भेजने का आश्वासन दिया था, जो पूरा नही किया। लेकिन उनकी नाराजगी को दूर करने के लिए भाजपा ने उन्हें साल 2018 के विधानसभा चुनाव में भिण्ड विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया। दुर्भाग्यवश वह यह चुनाव हार गए। लेकिन प्रदेश की राजनीति में चरम पर रहा नेता इस तरह के राजनीतिक वनवास को सहन नहीं कर पा रहा था। अतः 20 अप्रैल 2019 को शिवपुरी में ज्योतिरादित्य सिंधिया की एक चुनावी सभा में उन्होंने कांग्रेस में वापसी का ऐलान किया। लेकिन दिग्विजय सिंह और उनके समर्थकों के विरोध के चलते आलाकमान ने उनकी सदस्यता को अपनी मंजूरी नही दी और पिछले एक साल से उनकी सदस्यता का मामला अधर में लटका है।
जब मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार का पतन हुआ तब दिग्विजय समर्थकों ने उनसे कांग्रेस में आने का प्रस्ताव रखा। परन्तु पहले की कटुता ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। बाद में जब कमलनाथ ने चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी से सीधे बात की तो वर्षों से जमी कटुता की वर्फ पिघलने लगी और एक समय ऐसा आया कि कमलनाथ ने चौधरी राकेश सिंह को मेंहगांव से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया, तो उन्होंने भी सारे गिले-शिकवे भूलकर उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। यहां भी दिग्विजय सिंह और उनके समर्थक आड़े आ गए। एक बार फिर कमलनाथ की मौजूदगी में यह अहसास दिलाने की कोशिश की गई कि कांग्रेस में वही होगा, जो दिग्विजय सिंह चाहेंगे।
तो कांग्रेस की बढ़ जाएगी मुसीबत
एक बार के लिए यह मान लिया गया कि अजय सिंह की नाराजगी को देखते हुए कांग्रेस चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी को उम्मीदवार नहीं बनाती है। तब कमलनाथ की बात का क्या होगा? कमलनाथ के कहने पर मेंहगांव क्षेत्र में चुनावी तैयारी शुरु कर चुके चौधरी राकेश सिंह क्या अजय सिंह के विरोध के चलते अपने कदम वापस खींच लेंगे? या किसी अन्य राजनीतिक दल के उम्मीदवार के रुप में चुनावी रण में डटे रहेंगे? इन सब सवालों का जबाव भी बड़ा पेचीदा है। दरअसल चौधरी राकेश सिंह की पारिवारिक जड़े मध्य प्रदेश के साथ ही पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भी जमी हुई हैं। वहां उनके परिवार के बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती से न केवल अच्छे रिश्ते हैं, बल्कि राजनीतिक दखल भी है और यदि कांग्रेस यहां उन्हें उम्मीदवार बनाने से हिचकती है तो संभावना है कि वह बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार के रुप में मैदान में उतर जाएं। इन हालात में कांग्रेस की उम्मीद पर पानी फिरना तय है। क्योंकि कांग्रेस चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी को अपना उम्मीदवार घोषित करे या नही उनका यह चुनाव लड़ना तय है। यदि ऐसा हुआ तो मेंहगांव से कांग्रेस का जो भी उम्मीदवार होगा जातीय समीकरण बिगड़ने की मुसीबत उसे उठानी पड़ेगी।
विरासत में मिली राजनीति
जहां तक चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी के परिवार के राजनीतिक इतिहास का सवाल है, तो उन्हें राजनीति विरासत में मिली थी। टटलरी लॉर्डशिप को मान्यता देते हुए, उनके दादा को चौधरी के वंशानुगत खिताब से सम्मानित किया गया था। उनके पिता चौधरी दिलीप सिंह चतुर्वेदी देश में भाजपा के गठन के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव 1980 में भिंड विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के विधायक रहे। अस्वस्थ्य होने के कारण दिल्ली में उपचार के दौरान उनका निधन हो गया। जिसके बाद हुए चुनाव में यहां से कांग्रेस ने चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी को उम्मीदवार बनाया और वह पहली बार विधायक चुने गए। उनके छोटे भाई चौधरी मुकेश सिंह चतुर्वेदी भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं, जो 2013 के चुनाव में मेंहगांव विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए थे।
चौधरी ने 1979 में अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की जब वे भिंड के भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन के अध्यक्ष बने। उन्होंने 1983 और 1985 के बीच भिंड जिले में भारतीय युवा कांग्रेस के महासचिव के रूप में कार्य किया, और बाद में 1987 में भिंड मार्केटिंग सोसायटी के निदेशक के रूप में चुने गए। वे 1990 के चुनाव में भिंड से 9वीं मध्य प्रदेश विधान सभा के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में विधान सभा के सदस्य बने। यह वही निर्वाचन क्षेत्र था, जिसे उनके पिता ने 1980 के चुनाव में 7वीं मध्य प्रदेश विधान सभा के लिए भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में विधायक के रूप में जीता था, वे 1995 और 1996 के बीच भिंड में जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे, और बाद में 1996 के उपचुनाव के बाद 10वीं मध्य प्रदेश विधान सभा के सदस्य के रूप में फिर से चुने के गए। 1998 के चुनाव के बाद 11वीं मध्य प्रदेश विधानसभा में तीसरे कार्यकाल के बाद, चौधरी ने मध्य प्रदेश सरकार में मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के मंत्रिमंडल में शहरी विकास, आवास और पर्यावरण विभाग के कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ली। चौधरी ने भिंड सीट पर कांग्रेस का गढ़ बनाए रखा और 2008 के चुनावों के बाद 13वीं विधानसभा के लिए अपनी चौथी जीत दर्ज की। 2008 और 2013 के बीच मध्य प्रदेश विधानसभा में उन्हें मध्य प्रदेश कांग्रेस समिति और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विधायकों के प्रवक्ता के रूप में नियुक्त किया गया था। तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी ने उनकी संसदीय क्षमता को स्वीकार करते हुए ,उन्हें विपक्ष का उप नेता नियुक्त किया। जमुना देवी के निधन के बाद चौधरी ने मध्य प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के कार्यवाहक नेता के रूप में कार्य किया।
मैं कांग्रेस में हूं
कांग्रेस समन्वय समिति की बैठक में मंगलवार को क्या हुआ मुझे नही पता। मैं कांग्रेस में हूं। जब तक पार्टी का कोई अधिकृत नेता मेरे सम्बन्ध में कोई बयान नही देता मैं इस विषय पर कुछ भी नही बोलूंगा।
– चौधरी राकेश सिंह,पूर्व मंत्री

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