राजस्थान का प्रमुख लोकोत्सव गणगौर

0
29

राजस्थान में गणगौर का पर्व लोकोत्सव के रूप में सदियों से मनाया जाता रहा है। विवाहित व अविवाहित सभी आयु वर्ग की सुहागिन महिलायें गणगौर की पूजा करती है। होली के दूसरे दिन से सोलह दिनों तक लड़कियां प्रतिदिन ईसर-गणगौर को पूजती हैं। जिस लड़की की शादी हो जाती है वो शादी के प्रथम वर्ष अपने पीहर जाकर गणगौर की पूजा करती है। इसी कारण इसे ’सुहागपर्व’ भी कहा जाता है।
गणगौर का पर्व चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाया जाता हैं। महिलाये इस पर्व को विशेष रूप से मनाती हैं। होली के दूसरे दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) से अविवाहित व नवविवाहित महिलाएं प्रतिदिन गणगौर पूजती हैं। विवाहित महिलाएं पति के लम्बे सुहाग की रक्षा के लिये गणगौर का व्रत करती है। अविवाहित कन्याएं भी मनोवांछित वर पाने के लिए गणगौर का व्रत रखती हैं।
मान्यता है कि गणगौर व्रत और पूजा करने से महिलाओं के सुहाग की रक्षा होती हैं। गणगौर वाले दिन महिलाएं सज-धज कर सोलह श्रृंगार करती हैं और माता गौरी की विधि-विधान से पूजा करके उन्हें श्रृंगार की सभी वस्तुएं अर्पित करती हैं। वैसे तो गणगौर का पर्व देश भर में मनाया जाता है लेकिन राजस्थान में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ गणगौर पर्व लोकोत्सव के रूप में मनाया जाता है। गणगौर पर्व की मुख्य पूजा चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को की जाती है।
गणगौर शब्द भगवान शिव और पार्वती के नाम से बना है। गण यानि भगवान शिव और गौर यानि पार्वती। इसलिये शिव-पार्वती की पूजा के रूप में इस त्यौहार को मनाया जाता है। कहा जाता है कि चैत्र शुक्ला तृतीया को राजा हिमाचल की पुत्री गौरी का विवाह भगवान शंकर के साथ हुआ था उसी की याद में यह त्यौहार मनाया जाता है। कामदेव मदन की पत्नी रति ने भगवान शंकर की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न कर लिया तथा उन्हीं के तीसरे नेत्र से भष्म हुए अपने पति को पुन: जीवन देने की प्रार्थना की। रति की प्रार्थना से प्रसन्न हो भगवान शिव ने कामदेव को पुन: जीवित कर दिया तथा विष्णुलोक जाने का वरदान दिया। उसी की स्मृति में प्रतिवर्ष गणगौर का उत्सव मनाया जाता है। इस दौरान विवाह के समस्त रस्मो रिवाज किये जाते हैं।
होलिका दहन के दूसरे दिन गणगौर पूजने वाली बालिकायें होलीका दहन की राख लाकर उसके आठ पिण्ड बनाती हैं एवं आठ पिण्ड गोबर के बनाती हैं। गणगौर पूजने वाली लड़कियां उन सभी सोलह पिंडो को दूब पर रखकर प्रतिदिन उनकी पूजा करती हुई दीवार पर एक काजल व एक रोली की टिकी लगाती हैं। शीतलाष्टमी तक इन पिण्डों को पूजा जाता है। फिर मिट्टी से ईसर गणगौर की मूर्तियां बनाकर उनका पूजन करती हैं।
लड़कियां प्रात: ब्रह्ममुहुर्त में गणगौर पूजते हुये गाती हैं। गीत गाने के बाद लड़कियां गणगौर की कहानी सुनती है। दोपहर को गणगौर के भोग लगाया जाता है तथा गणगौर को कुए से लाकर पानी पिलाया जाता है। लड़कियां कुए से ताजा पानी लेकर गीत गाती हुई आती हैं। लड़कियां गीतों में गणगौर के प्यासी होने पर काफी चिन्तित लगती है एवं वे गणगौर को शीघ्रतिशीघ्र पानी पिलाना चाहती है। पानी पिलाने के बाद गणगौर को गेहूं चने से बनी ’’घूघरी’’ का प्रसाद लगाकर सबको बांटा जाता है और लड़कियां गाती हैं:-
महारा बाबाजी के माण्डी गणगौर, दादसरा जी के माण्ड्यो रंगरो झूमकड़ो,
ल्यायोजी – ल्यायो ननद बाई का बीर, ल्यायो हजारी ढोला झुमकड़ो।
रात को गणगौर की आरती की जाती है तथा लड़कियां नाचती हुई गाती हैं:-
म्हारा माथान मैमद ल्यावो म्हारा हंसा मारू यहीं रहवो जी,
म्हारा काना में कुण्डल ल्यावो म्हारा हंसा मारू यहीं रहवोजी।
गणगौर पूजन के मध्य आने वाले एक रविवार को लड़कियां उपवास करती हैं। प्रतिदिन शाम को क्रमवार हर लड़की के घर गणगौर ले जायी जाती है, जहां गणगौर का ’’बिन्दौरा’’ निकाला जाता है तथा घर के पुरुष लड़कियों को भेंट देते हैं। गणगौर विसर्जन के पहले दिन गणगौर का सिंजारा किया जाता है। लड़कियां हाथों में मेहन्दी रचाती हैं, नये कपड़े पहनती हैं, घर में पकवान बनाये जाते हैं। सत्रहवें दिन लड़कियां नदी, तालाब, कुए, बावड़ी में ईसर गणगौर को विसर्जित कर विदाई देती है।
गणगौर की विदाई का बाद श्रावण की तीज तक कोई लोक पर्व नहीं आते इसलिए कहा गया है। तीज त्यौहारा बावड़ी ले डूबी गणगौर। अर्थात् जो त्यौहार तीज (श्रवणमास) से प्रारम्भ होते हैं उन्हें गणगौर ले जाती है। ईसर-गणगौर को शिव पार्वती का रूप मानकर ही बालाऐं उनका पूजन करती हैं। गणगौर के बाद बसन्त ऋतु की बिदाई व ग्रीष्म ऋृतु की शुरुआत होती है। घर से दूर रहने वाले युवक गणगौर के पर्व पर अपनी नव विवाहित प्रियतमा से मिलने अवश्य आते हैं।
राजस्थान की राजधानी जयपुर में गणगौर उत्सव दो दिन तक धूमधाम से मनाया जाता है। ईसर और गणगौर की प्रतिमाओं की शोभायात्रा राजमहलों से निकलती है। इनके दर्शन करने देशी-विदेशी सैलानी उमड़ते हैं। सभी उत्साह से भाग लेते हैं। इस उत्सव पर एकत्रित भीड़ जिस श्रृद्धा एवं भक्ति के साथ धार्मिक अनुशासन में बंधी गणगौर की जय-जयकार करती हुई भारत की सांस्कृतिक परम्परा का निर्वाह करती है जिसे देख कर अन्य धर्मावलम्बी इस संस्कृति के प्रति श्रृद्धा भाव से ओतप्रोत हो जाते हैं। ढूंढाड़ की भांति ही मेवाड़, हाड़ौती, शेखावाटी सहित राजस्थान के विशाल नगरों में ही नहीं बल्कि गांव-गांव में गणगौर पर्व मनाया जाता है एवं ईसर-गणगौर के गीतों से हर घर गुंजायमान रहता है।
राजस्थान को देव भूमि कहा जाय तो अनुचित नहीं होगा। प्राचीन काल से ही यह वीर भूमि सर्व धर्म शरणदायनी रही है। इसी कारण सभी पूजा पद्धतियों एवं सम्प्रदाय यहां वैचारिक दृष्टि से फले फूले हैं। राजस्थानी शासकों ने लोक मान्यताओं का सदा सम्मान किया है। इसी कारण यहां सभी देवी देवताओं के उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाये जाते हैं। गणगौर का उत्सव भी ऐसा ही लोकोत्सव है, जिसकी पृष्ठ भूमि पौराणिक है। हमें आज आवश्यकता है इस लोकोत्सव को मनाये जाने की परम्परा को अक्षुण बनाये रखने की। इसका दायित्व है उन सभी सांस्कृतिक परम्परा के प्रेमियों पर जिनका इससे लगाव है और जो लोकोत्सव को सिर्फ पर्यटक व्यवसाय की दृष्टि से न देखकर भारत के सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से देखने के हिमायती हैं।

LEAVE A REPLY