लेख विवाद : दिग्गीराजा के लेख का जयविलास से आया करारा जवाब

0
87

ग्वालियर।अजयभारत न्यूज
ऐसा लगता है की अपनी कारगुजारियों के कारण मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार की लुटिया डुबोने वाले प्रदेश के पूर्व dr.keshav pandayमुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह अभी भी शांत नहीं बैठे हैं ,उन्होंने एक लेख लिखकर ज्योतिरादित्य सिंधिया पर कई आरोप मढ़ दिए। देर शाम इन आरोपों का एक एक कर जवाब आया जय विलास से यह जवाब सीधे सिंधिया ने न देकर उनके जनसम्पर्क अधिकारी व प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार डॉ केशव पांडे ने दिया । जवाब में बारी बारी से दिग्विजय के एक एक आरोप की डॉ. पांडे ने न केवल तर्कसंगत ढंग से बखिया उधेड़ी बल्कि दिग्गीराजा को कांग्रेस की डूबती नय्या के लिए दोषी करार देते हुए सीधे सीधे बंटाढार कह दिया। पाठकों के लिए दिग्गविजय सिंह के लेख का जयविलास से आया जवाब जस की तस प्रकाशित किया जा रहा है।
मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक लेख लिखा है कि ‘हमारा लक्ष्य सत्ता नहीं संघर्ष संघ की विचारधारा से’ इस लेख को पढ़कर लोकतांत्रिक तरीके से उसका जवाब देना और लोगों को सच्चाई से रूबरू कराना हमारा दायित्व है। दिग्विजय सिंह का पहला आरोप है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस पार्टी छोड़ी और सरकार गिरा दी जिससे कांग्रेस कार्यक्रताओं और आम लोगों जो कांग्रेस की विचारधारा में यकीन रखते थे उन्हें निराशा हुई।
इसका जवाब यह है कि श्री दिग्विजय सिंह के इस आरोप को शायद ही प्रदेश का कोई व्यक्ति अपने गले के नीचे उतार सके क्योंकि श्री सिंह प्रदेश में मि. बंटाधार के नाम से प्रसिद्ध ही इसलिए हुए थे कि उन्होंने अपनी नीतियों से कांग्रेस पार्टी का प्रदेश में इतना बंटाधार कर दिया था कि पार्टी 38 सीटों पर सिमट गई और पार्टी को पुर्नजीवित उसी समय किया जा सका जब प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे किया गया। श्री सिंधिया ने अपने अंचल की लगभग सभी सीटें कांग्रेस की झोली में सौंप दी। चुनाव के समय जनता को सिंधिया जी का चेहरा दिखाकर अप्रत्यक्ष रूप से यही संदेश दिया गया था कि पार्टी श्री सिंधिया को ही मुख्यमंत्री बनाएगी। स्वयं दिग्विजय सिंह चुनाव के समय अज्ञातवास पर रहे और जीतू पटवारी के घर से निकलते समय उन्हें यह कहते हुए सुना गया कि मुझे पार्टी ने मुंह बंद करने को कहा है। फिर यह कैसे हुआ जो दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस पार्टी को जीत के बाद हाईजैक कर लिया और जिस सिंधिया ने कांग्रेस की नैया पार लगाई उसे ही डुबोने के पहले दिन से षणयन्त्र चलने लगे। इसलिए श्री दिग्विजय सिंह का यह आरोप निराधार है। दिग्विजय सिंह का दूसरा आरोप है कि श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस में उचित पद और सम्मान मिलने की संभावना खत्म होने के बाद पार्टी छोड़कर चले गए जबकि उन्हें 2013 में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का ऑफर हुआ था।
इस आरोप का उत्तर यही है कि सिंधिया परिवार जनसेवा को अपना मिशन बनाकर चलता रहा है। श्री दिग्विजय सिंह जिस समय की बात कर रहे हैं वे 10 वर्ष के राजनैतिक क्वारेन्टीन में थे। अगर सिंधिया पद के भूखे होते तो उनके इस राजनैतिक क्वारेन्टीन अवधि में इस पद को ले लेते। हकीकत यह है कि दिग्विजय सिंह हमेशा झूठ बोलते हैं झूठ उनकी दिनचर्या में आ चुका है। अगर वे सच बोलने का प्रयास भी करें तो प्रदेश की सात करोड़ जनता को वह झूठ ही लगता है। दिग्विजय सिंह का तीसरा आरोप यह है कि 2018 में चुनाव के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया को उप मुख्यमंत्री पद ऑफर किया गया था पर सिंधिया ने यह पद खुद न लेकर तुलसी सिलावट को देने की बात कही जिस पर कमलनाथ राजी नहीं हुए और हाल के घटनाक्रम में जब सिलावट बागी हो गए तो कमलनाथ ने ठीक ही किया।
इस आरोप की हकीकत यह है कि दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ को पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया। अगर उनकी बात मान भी ली जाय तो श्री सिलावट अगर उप मुख्यमंत्री होते भी तो दलित समाज में अच्छा संदेश जाता। दूसरी बात श्री सिलावट के बागी होने की है तो कई दिग्विजय सिंह समर्थक जैसे के पी सिंह, एंदल सिंह और बिसाहूलाल सिंह सहित लगभग सभी वरिष्ठ लोग अपनी उपेक्षा, क्षेत्र में उनकी अनसुनी और श्री सिंह के प्रशासनिक अमले पर मजबूती के कारण अधिकारियों को इस प्रकार तैनात किया कि कांग्रेस सरकार की यह दुखद परिणीति हुई।
दिग्विजय सिंह नीत कमलनाथ सरकार ग्वालियर चंबल अंचल में श्री सिंधिया की जादुई नेतृत्व की शैली को नेस्तनाबूत करना चाहते थे। समर्थक विधायकों और मंत्रियों को जानबूझकर इतना हाशिये पर लाया गया कि मुन्नालाल गोयल को अपनी ही सरकार के खिलाफ विधानसभा परिसर में गांधीजी की प्रतिमा के नीचे बैठना पड़ा। ग्वालियर में मंत्री प्रद्युम्न सिंह को नाले में उतरते और नगर निगम अधिकारी के पैर छूते पूरे प्रदेश ने देखा है। इसलिए इस बगावत के लिये अगर कोई जिम्मेदार है तो दिग्विजय सिंह और कमलनाथ हैं।
दिग्विजय सिंह का यह आरोप कि घर को बचाने की बजाय घर को आग लगाना समझदारी नहीं। और श्री सिंह ने यह भी कहा कि मैंने अपने 10 साल के मुख्यमंत्रित्व काल में अर्जुन सिंह, श्यामचरण शुक्ल, विद्याचरण शुक्ल, माधवराव सिंधिया और मोतीलाल बोरा को उचित सम्मान दिया।
इसका उत्तर सभी जानते हैं क्योंकि दिग्विजय सिंह का 10 साल का कार्यकाल सभी ने देखा है । उन्होंने अपने कार्यकाल में जिसकी पीठ पर हाथ रखा उसे ही नेस्तनाबूद कर दिया। प्रदेश का बंटाधार कर दिया और श्रीमन्त माधवराव सिंधिया जैसे नेशनल आइकॉन को प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया। महल को लगातार कमजोर करने के एकसूत्री कार्यक्रम पर वे चलते रहे जिसकी परिणीति इस रूप में हुई। दिग्विजय सिंह ने लिखा है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के टॉप लीडर थे, वे 9 साल UPA में मंत्री रहे, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी, AICC के महासचिव और कार्यकारिणी के सदस्य थे। इसलिए उन्हें पर्याप्त सम्मान मिला।
इस आरोप की हकीकत सभी जानते हैं और जिसे ज्योतिरादित्य सिंधिया कई बार दुहरा चुके हैं कि वे पद के भूखे नहीं हैं, उन्होंने जनसेवा के लिए कांग्रेस को अपना माध्यम बनाया। कांग्रेस ने उन्हें सम्मान दिया तो श्री सिंधिया ने एक चमकते हुए तारे की तरह कांग्रेस को अपनी रोशनाई से मजबूत किया। लेकिन जब उन्हें लगा कि वे जनसेवा का यह मिशन कांग्रेस में रहकर ज्यादा दूर तक नहीं कर सकते जैसा कि उन्होंने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी को लिखा भी था कि पार्टी ने उन्हें जो सम्मान दिया वे हमेशा आभारी रहेंगे पर वे शीर्ष नेतृत्व की निर्णय न लेने की नीति के तहत अपना जनसेवा मिशन जारी रखने में असहज पा रहे हैं तो दिग्विजय सिंह के ये आरोप मिथ्या और मूल प्रश्न से जनता का ध्यान भटकाने वाले हैं।
अंततोगत्वा निष्कर्ष यह है कि दिग्विजय सिंह खुद अपनी राज्यसभा सीट पक्की करने और अपने पुत्र को मध्यप्रदेश की राजनीति में स्थापित करना चाहते थे । उन्होंने अपने पूरे जीवन में शायद ही कभी सच बोला हो। दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में ही कैलाशवासी श्रीमन्त माधवराव सिंधिया द्वारा स्थापित मालनपुर और बामौर औद्योगिक क्षेत्र बर्बाद किये गए ग्वालियर को औद्योगिक परिधि से निकाल दिया गया और स्वयं को स्थापित करने में इस प्रकार लगे रहे कि विकास पुरुष ज्योतिरादित्य सिंधिया जी ने तत्कालीन पीएम मनमोहनसिंह को इस औधोगिक क्षेत्र के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराने के लिए सार्थक प्रयास किये। जब कांग्रेस पार्टी नेतृत्व विहीन हो गयी तो श्रीमन्त सिंधिया जी ने यह फैसला लिया।

LEAVE A REPLY