सहकारिता विभाग के कानून बने रोड़ा…भंग पड़ी संस्थाओं में भूखंडों का आवंटन फिलहाल ठप

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-प्रशासकों को अधिकार ही नहीं, उच्च स्तरीय मॉनेटरिंग कमेटी के गठन की मांग शासन के पास लंबित
भोपाल । मुख्यमंत्री कमलनाथ की सख्ती के चलते पुलिस-प्रशासन भूमाफियाओं से पीडि़तों को न्याय दिलवाने में जुटा हैं, मगर सहकारिता विभाग के कई कानून उसमें रोड़े बन रहे हैं। 14 साल पहले पंजीयक सहकारी संस्थाओं द्वारा भूखंडों के आवंटन से लेकर अन्य निर्णयों के लिए प्रशासकों के अधिकार सीमित कर दिये थे, जिसमें परिवर्तन करने की मांग अधिकारियों ने की है। अभी अधिकांश दागी संस्थाओं में संचालक मंडल भंग पड़े हैं और प्रशासक के पास जिम्मा है। अब उच्च स्तरीय मॉनेटरिंग कमेटी बनाने के अधिकार शासन से मांगे गए हैं, ताकि भूखंडों के आवंटन से लेकर रजिस्ट्री निरस्त कराने सहित अन्य निर्णय लिये जा सकें, मगर शासन ने अभी तक इसकी मंजूरी ही नहीं दी है।
एक तरफ मुख्यमंत्री कमलनाथ हर तरह के माफिया के चंगुल से प्रदेश को मुक्त करवाना चाहते है और बिना राजनीतिक दबाव प्रभाव के उन्होंने अधिकारियों को कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र भी कर दिया है। प्रदेश में गृह निर्माण संस्थाओं की ही सबसे अधिक शिकायतें पुलिस-प्रशासन को लगातार मिल रही है। अधिकांश चर्चित गृह निर्माण संस्थाओं पर भूमाफियाओं ने कब्जे कर रखे हैं और सदस्यों की जमीने या तो बेच दी या उनकी कई रजिस्ट्रियां नए सदस्यों को बनाकर कर डाली। अधिकांश ऐसी दागी संस्थाओं के संचालक मंडल सालों से भंग पड़े हैं।
कई संस्थाओं के संचालक मंडल हैं भंग
10 साल पहले भी जब भूमाफिया के खिलाफ जब अभियान चला था उस दौरान भी प्रशासन के निर्देश पर सहकारिता विभाग ने कई संस्थाओं के संचालक मंडलों को भंग कर दिया था, क्योंकि ये भूमाफियाओं के कब्जे में थे। सहकारी अधिनियम 1960 की धारा 49(8), 53(1), 53(10) एवं 53(13) के अंतर्गत विभागीय अधिकारियों के पास संस्थाओं का अधिकार रहने के दौरान कार्य संचालन के संबंध में निर्देश जारी किये गए थे, जिसमें संस्थाओं में नियुक्त विभागीय अधिकारियों द्वारा संपत्ति अर्जन, संपत्तियों के विनियोजन, भूखंडों के आवंटन, संपत्तियों के विक्रय, नवीन सदस्य बनाने, कर्मचारियों की नियुक्ति और विकासीकरण के नए कार्य आरंभ करने पर प्रतिबंध लगाते हुए केवल सामान्य कार्य संचालन के ही अधिकार प्रशासकों को दिये गए। दरअसल कुछ वर्ष पूर्व शासन को यह शिकायतें मिली कि विभागीय अधिकारियों यानी प्रशासकों ने भी जमकर मनमानी की और जमीनों को बिकवाने, एनओसी जारी करने, नए सदस्य बनाने और भूखंडों के आवंटन में जमकर धांधली की गई, जिसके चलते तत्कालीन पंजीयक सहकारी संस्थाएं प्रभात पारासर ने 1 दिसंबर 2006 को भंग पड़ी संस्थाओं के कार्य संचालन के संबंध में विभागीय अधिकारियों के पास क्या-क्या अधिकार रहेंगे इसको लेकर पांच बिन्दूओं पर आदेश जारी किये, जिसमें नए सदस्य बनाने से लेकर भूखंडों के आवंटन और अन्य निर्णयों पर रोक लगाई गई और कहा कि प्रभारी अधिकारी जल्द से जल्द नवीन संचालक मंडल का निर्वाचन करवाए और संस्था के संचालक मंडल पर लगे आरोपो की जांच कर उसका कार्रवाई प्रतिवेदन हर माह भिजवाए। अगर न्यायालीन प्रकरण के कारण किसी संस्था के चुनाव जल्द नहीं कराए जाना संभव हो तो पूर्व से बनाए गए सदस्यों को अधिनियम 1960 की धारा 72 डी में उल्लेखीत प्रावधानों के मुताबिक आवंटित भूखंडों को पंजीकृत करने का प्रस्ताव मुख्यालय द्वारा गठित समिति से समक्ष प्रस्तुत किये जाये और समिति के निर्णय अनुसार ही आवश्यक कार्रवाई की जाए।
प्रशासकों के पास कोई अधिकार ही नहीं
अभी ऑपरेशन क्लीन के चलते भंग पड़ी संस्थाओं के चलते भूखंडों के आवंटन से लेकर अन्य प्रक्रिया इसीलिए ठप पड़ी है, क्योंकि प्रशासकों को कोई अधिकार ही नहीं है। लिहाजा पिछले दिनों इंदौर संभागायुक्त आकाश त्रिपाठी ने प्रमुख सचिव सहकारिता विभाग को पत्र लिखा जिसमें अनुरोध किया गया कि चुकी प्रशासक संस्थाओं के कार्य संचालन और सदस्यों के हितों के लिए आवश्यक कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं। लिहाजा तीन सदस्य अधिकार संपन्न कमेटी को मंजूरी दी जाए। इस कमेटी में जिले के अपर जिला दंडा अधिकारी या अपर कलेक्टर के अलावा संभागीय सयुक्त आयुक्त सहकारिता और जिला उपायुक्त सहकारिता को नामांकित किया जा सकता है और यह कमेटी गृह निर्माण संस्थाओं के संबंध में संपत्तियों के विनियोजन, भूखंडों के आवंटन, संपत्तियों के पंजीयन, विक्रय, नवीन सदस्यता प्रदान करने और विकासीकरण कार्य करा सकेगी। संभागायुक्त के इस पत्र के आधार पर अभी तक लगभग एक माह पश्चात भी शासन स्तर पर इसकी मंजूरी लंबित पड़ी है।
बिना समिति आवंटन नहीं
सहकारिता से लेकर प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि जब तक तीन सदस्यीय अधिकार समिति को मंजूरी नहीं मिलती, तब तक भंग पड़ी संस्थाओं के संबंध में भूखंडों के आवंटन से लेकर अन्य जरूरी कार्यवाहियां नहीं की जा सकेगी, जबकि दूसरी तरफ मार्च अंत तक 4 से 5 हजार पीडि़तों को भूखंड उपलब्ध करवाने का लक्ष्य तय कर रखा हैं। अभी 18 फरवरी को मुख्यमंत्री कमलनाथ इंदौर आ रहे हैं और एक गृह निर्माण संस्था मजदूर पंचायत की कालोनी पुष्प विहार के पीडि़तों से रेसीडेंसी पर मिल भी रहे हैं और उसके बाद अधिकारियों के साथ भी बैठक करेंगे, जिसमें यह मुद्दा भी शामिल रहेगा।

भूमाफियाओं ने ही बैठा रखे अधिकांश प्रशासक
गृह निर्माण संस्थाओं पर जहां भूमाफियाओं ने कब्जा किया, वहीं अपने रिश्तेदारों से लेकर कर्मचारियों को अध्यक्ष सहित संचालक मंडल में अन्य महत्वपूर्ण पदों पर बैठा दिया और मन मुताबिक जमीनों की अफरा-तफरी करते रहे। इतना ही नहीं कई संस्थाओं में तो मूल किसानों या उनके वारिसों के माध्यम से भी जमीनों के नए अनुबंध कर डाले। शासन-प्रशासन की कार्रवाई के चलते जिन गृह निर्माण संस्थाओं के संचालक मंडलों को भंग किया गया उनमें प्रशासकों की नियुक्ती की गई, लेकिन अधिकांश प्रशासक भी भूमाफियाओं के ही खास निकले। सहकारिता विभाग पर चुकी वर्षों से भूमाफियाओं का कब्जा रहा, लिहाजा वहां के जो अधिकारी प्रशासक बनाए गए वे सब भूमाफियाओं की कठपुतली ही रहे और मनचाहे जमीनों के खेल करवाते रहें, जिसके चलते शासन ने प्रशासकों के अधिकार सीमित कर दिये। अब चल रहे अभियान में भंग पड़ी संस्थाओं में निर्णय लेने के लिए प्रशासकों की जगह तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय कमेटी गठित करने की मंजूरी शासन से मांगी गई है।

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