अनुराग कश्यप, श्याम बेनेगल समेत 49 हस्तियों ने PM मोदी को लिखा पत्र, कहा- आज “जय श्री राम” उकसाने वाला नारा बन गया है

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नई दिल्ली । देश भर में लगातार हो रही मॉब लिंचिंग की घटनाओं और जय श्रीराम नारे के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए अलग-अलग क्षेत्रों की 49 हस्तियों ने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखी है। चिट्ठी में अपर्णा सेन, कोंकणा सेन शर्मा, रामचंद्र गुहा, अनुराग कश्यप, शुभा मुद्गल जैसे अलग-अलग क्षेत्र के दिग्गजों के हस्ताक्षर हैं। पीएम को संबोधित करते हुए चिट्ठी में लिखा गया है कि देश भर में लोगों को जय श्रीराम नारे के आधार पर उकसाने का काम किया जा रहा है। साथ ही दलित, मुस्लिम और दूसरे कमजोर तबकों की मॉब लिंचिंग को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की गई है।
चिट्ठी में लिखा गया, ‘आदरणीय प्रधानमंत्री… मुस्लिम, दलित और दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की लिंचिंग तत्काल प्रभाव से बंद होनी चाहिए। नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े देख हम हैरान हैं। एनसीआरबी के डेटा के अनुसार, दलितों के साथ 2016 में 840 हिंसक घटनाएं हुईं। इन अपराध में शामिल लोगों को दोषी करार देने के आंकड़े में भी कमी आई है।’ नैशनल अवॉर्ड विनर डायरेक्टर अपर्णा सेन और मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने भी इस पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं।
‘लिंचिंग रोकने के लिए आपकी निंदा करना पर्याप्त नहीं’
ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कानून की मांग पत्र में की गई। पत्र में लिखा गया, ‘आपने संसद में लिंचिग की घटना की निंदा की थी, लेकिन वह काफी नहीं है। हम सभी को ऐसा मजबूती से लगता है कि इस तरह के अपराधों को गैर-जमानती बनाया जाए।’ झारखंड में 24 साल के शख्स की लिंचिंच की प्रधानमंत्री मोदी ने जून में निंदा की थी।
जय श्री राम नारे का इस्तेमाल लिंचिंग के लिए हो रहा
पत्र में जय श्रीराम के नारे के दुरुपयोग पर भी चिंता जाहिर की गई है। पत्र के अनुसार, ‘बहुत अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इन दिनों जय श्रीराम का नारा युद्ध उन्माद जैसा बनता जा रहा है। कानून और व्यवस्था तोड़ने के लिए और बहुत बार लिंचिंग के वक्त भी इसी नारे का प्रयोग किया जा रहा है। यह देखना हैरान करनेवाला है कि धर्म के नाम पर ऐसा किया जा रहा है। राम के नाम पर ऐसे अपराध को अंजाम देने की घटनाओं पर लगाम लगाना जरूरी है।’
‘सरकार की आलोचना का अर्थ देश की आलोचना नहीं’
विभिन्न क्षेत्रों से ताल्लुक रखनेवाले 49 लोगों ने पत्र में लिखा कि देश की सत्ताधारी पार्टी की आलोचना देश की आलोचना नहीं है। पत्र के अनुसार, ‘देश की सत्ताधारी पार्टी की आलोचना करना देश की आलोचना करने जैसा नहीं है। किसी भी देश की सत्ताधारी पार्टी उस राष्ट्र के समानांतर नहीं हो सकती। सत्ताधारी पार्टी देश की बहुत सी पार्टियों में से ही एक पार्टी भर होती है। सरकार के खिलाफ लिए जानेवाले कदम को राष्ट्र के खिलाफ उठाया कदम नहीं करार दिया जा सकता।’

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