वरुथिनी एकादशी पर विशेष… सौभाग्य का प्रतीक अर्थात् वरुथिनी एकादशी व्रत

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– गोविंद चन्दोरिया
इस बार वरुथिनी एकादशी व्रत मंगलवार 30 अप्रैल 2019 को है। इस व्रत की अपनी महत्वता है। कहा जाता है कि जो वरुथिनी एकादशी की व्रत पूजा करता है उसे भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है। व्रतधारी को सौभाग्य प्राप्त होता है, इस प्रकार यह व्रत सौभाग्यशाली ही रख पाते हैं। मान्यता अनुसार वरुथिनी एकादशी में व्रत करने से संतानें दीर्घायु होती हैं। उन्हें किसी प्रकार के संकट का सामना भी नहीं करना होता है। किसी दुर्घटना से सुरक्षित रखने का काम भी यह व्रत करता है।
यहां आपको बतला दें कि वरुथिनी एकादशी व्रत में विष्णु भगवान की पूजा की जाती है। मान्यता है कि वरुथिनी एकादशी का व्रत करने से विष्णु भगवान प्रसन्न होकर खूब धन-धान्य करते हैं। वैशाख माह में 2 एकादशी आती हैं, इसमें से कृष्ण पक्ष की एकादशी को ही वरुथिनी एकादशी कहा जाता है।
वरुथिनी एकादशी की कथानुसार बताया जाता है कि सदियों पहले नर्मदा नदी के तट पर एक राजा निवास करता था। राजा का नाम मानधाता था। राजा बहुत दयालु, धार्मिक और दान-पुण्य करने वाला था। यही नहीं बल्कि राजा भगवान को भी बहुत मानता था। राजा तपस्वी था और जंगल में बैठकर घंटों भगवान विष्णु की तपस्या किया करता था, ताकि उसे भगवान विष्णु मिल सकें। एक दिन जबकि वो तपस्या में लीन था, एक जंगली भालू आ गया और वो राजा को मुंह से पकड़कर जंगल की ओर ले जाने लगा। इस पर राजा ने जरा भी क्रोध नहीं किया और वह अपनी तपस्या में ही लीन रहा। तपस्या करते हुए ही राजा ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि ‘हे भगवन मुझे इस संकट से बचाएं।’ राजा की भक्ति और तपस्या से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और प्रकट हो अपने चक्र से भालू को मार गिराया। चूंकि भालू ने राजा का पैर जख़्मी कर दिया था अत: राजा बहुत दुखी हुआ। इस पर विष्णु भगवान ने राजा से कहा कि वो मथुरा चले जाएं और वहां वरुथिनी एकादशी का व्रत करें और मेरी वराह अवतार मूर्ती की पूजा करें। ऐसा करने पर राजा को आश्वत किया कि उनके चोटिल सारे अंग और पैर ठीक हो जाएंगे। राजा ने ऐसा ही किया और विष्णु के कहे अनुसार ही वो बिल्कुल ठीक भी हो गया। इसलिए यह मान्यता है कि जो व्यक्ति वरुथिनी एकादशी की व्रत-पूजा करता है, उसे चोट नहीं लगती और उसके साथ कोई दुर्घटना भी घटित नहीं होती।
ऐसी भी मान्यता है कि वरुथिनी एकादशी पर व्रत रखने से इस लोक के साथ परलोक में भी पुण्य प्राप्त होता है। धर्म ज्ञाता व पंडितों का कहना है कि वरुथिनी एकादशी की पूजा करते समय इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सबसे पहले तो इसमें विष्णु भगवान की व्रत-पूजा होनी चाहिए। सुबह के समय गंगाजल से स्नान करना उत्तम होता है और उसके बाद सफ़ेद वस्त्र धारण करने चाहिए। एक कलश की स्थापना करते हुए उसके ऊपर आम के पल्लव, नारियल, लाल चुनरी बांधकर रखना चाहिए। धूप, दीपक जलाकर बर्फी, खरबूजा और आम का भोग लगाएं और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करना चाहिए। खास बात यह है कि यह व्रत अगले दिन पूजा पाठ करके ही खोला जाता है। व्रत के समय सिर्फ फलाहार ही किया जा सकता है।

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