होली विशेष…बहुत प्रतीकात्मक हैं होली के रंग

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शुद्ध सात्विक पेड़-पौधों और फूलों के रंगों का त्योहार है होली। रंगों की बरसात है होली। रंगों की फुहार है होली। रगं,भंग और तरंग का त्योहार है होली। बिना रंगों के होली की कल्पना भी नहीं की जा सकती। संभवत विश्व में कोई अन्य त्योहार इतना रंग बिरंगा नहीं है जितना हमारी होली। एक ऐसा दौर भी था जब लोग फूल पत्तियों जैसे टेसू, केवड़ा गुलाब, अमलताश, मेहंदी और चंदन इत्यादि सुगंधित पुष्पों से निर्मत्त रंगों से ही होली खेलते थे और हल्दी, चंदन तथा दूध इत्यादि का लेप लगा कर एक दूसरे के प्रति अपनी शुभकामनाएं व्यक्त करते थे। इसके पीछे मुख्य कारण यह था कि इन सुगंिधत दव्यों से विभिन्न प्रकार के रोगों का उपचार हो जाता था। इन से शरीर कोमल,स्निग्ध और शीतल बना रहता था। आज कल स्थिति बदल गई है। अब रसायनिक रंगों,ग्रीस,आइल पेंटस,तारकोल,कीचड़ और गोबर से होली के अवसर पर हुड़दंग मचाने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है जोकि समाज में कई प्रकार की विकृतियां पैदा करने का कारण बन रहा है। इसे रोकने के लिए हर्बल होली मनाने के प्रयासों को सरकार द्वारा प्रोत्साहित किया जा रहा है। पर्यावरण में होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए भी सरकार रसायनिक रंगों पर रोक लगाने का प्रयास करती रहती है परन्तु लोगों के उत्साह के कारण उस काम में सफल नहीं हो पाती।
दीपों के त्योहार दीपावली के साढे चार माह के अन्तराल के पश्चात फाल्गुनी पूर्णिमा को मनाया जाता है यह रंगों से भरी तरंगों का त्योहार। यह त्योहार समाज का हर वर्ग,स्त्री पुरुष और बच्चे, बूढे और जवान बिना किसी भेद भाव के पूरी मस्ती के साथ मनाते हैं। इसमें किसी प्रकार का कोई भेद भाव कहीं भी दिखाई नहीं देता। यह त्योहार बसंत ऋतु का प्रमुख त्योहार है। पतझड़ के पश्चात प्रकृति नए नए परिधान पहन कर अनेकानेक रंगों में चारों ओर का वातावरण रंगीन बना देती है। वास्तव में रंग हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं। रंगों के अभाव में तो पूरा जीवन ही नीरस लगने लगेगा। रंगों का हमारे शरीर,मन और भावना के स्तर पर बहुत गहरा प्रभाव होता है। प्राचीन काल से ही हमारे ऋषियों ने इस तथ्य को जान लिया था कि मानव के व्यक्तित्व,विचारों और मनोभावों के साथ रंगों का बहुत गहरा रिश्ता है। हम किस प्रकार के रंगे पुते भवन में रहते हैं,किस रंग का आहार लेते हैं, किस प्रकार का रंगीन परिधान पहनते हैं इन सबका हमारे विचारों और क्रिया कलापों पर असर होता है। यही कारण है कि अस्पतालों में डाक्टर और नर्सें सफेद परिधान पहनते हैं। न्यायालयों में वकील और न्यायाधीश काले रंग के वस्त्र धारण करते हैं और आपरेशन कक्ष में डाक्टर हरे वस्त्र पहन कर रोगी का आपरेशन करते हैं।
जैसे मानव पर सूर्य की किरणों का प्रभाव होता है वैसा ही प्रभाव रंगों का भी होता है। आखिर रंग भी तो प्रकाश का ही अंश होते हैं। रंग हमारे ज्ञान तंतुओं और उनकी दक्षता को प्रभावित करते हैं। गुलाबी रंग हमारी उद्दडता को कम करके हमारी दक्षता में वृद्धि करते हैं। पीला रंग हमारे ज्ञान तंतुओं को संयत करता है। नीले रंग के प्रयोग से शांति मय वातावरण का निर्माण होता है। हरे रंग में रोग मिटाने की अपूर्व क्षमता होती है। मौसम में भी रंगों का महत्व होता है। सरदी में आम तौर पर गहरे रंगों के वस्त्र पहने जाते हैं तो गरमी के दिनों हल्के रंगों और सफेद कपड़ों को प्राथमिकता दी जाती है। शरीर विज्ञान के अनुसार भी हमारे जितने ग्लैंडस हैं उनके भिन्न भिन्न रंग हैं। जितने चैतन्य केन्द हैं उनके भी अपने अपने रंग हैं। यह सारे रंग हमारे जीवन को अलग अलग ढंग से प्रभावित करते हैं। इन रंगों का परस्पर सामंजस्य होने से मानव का जीवन सुख और शान्ति से परिपूर्ण रहता है।
जैन दर्शन में इस बात को स्वीकार किया गया है कि जैसा भाव होता है वैसा ही रंग बन जाता है और जैसा रंग होता है वैसा ही भाग्य बन जाता है। इसी कारण जैन दर्शन में छ मनोभावों के लिए छ प्रकार की लेश्याएं निर्धारित की गई हैं। इसी प्रकार रंगों को उनकी गहराई के कारण भी अलग माना गया है। हल्के और गहरे रंगों के अलग अलग प्रभाव होते देखे गए हैं। हल्के लाल रंग को अध्यात्म का रंग माना गया है जबकि गहरा हरा कर्म का रंग स्वीकार किया गया है। होली प्रकृति का पर्व है। प्रकृति में रंगों का सामंजस्य जैसे आनन्द भर देता है कुछ वैसा ही रंगों का तालमेल मानव जीवन में भी हो यही भावना सामने रख कर होली जैसे त्योहार की संरचना हुई होगी। इसके लिए सबसे उपयुक्त मौसम बसंत का ही हो सकता था। बसंत के आगमन के साथ ही प्रकृति के साथ साथ मानव मन भी उत्साह और उमंग से भर उठता है। जनमानस पर एक विशेष प्रकार की मादकता छाने लगती है। दुर्भाग्यवश यही मादकता धीरे धीरे अश्लीलता और उच्छृंखलता का रूप लेती जा रही है। होली जैसे पावन अवसर पर लेड़ आक्साइड,कॉपर सल्फेट,एल्युमिनियम ब्रोमाइड,पैराफिनाइल और अन्य ऐसे ही पदार्थों से युक्त रंगों का प्रयोग करना असभ्यता और निकृष्ट मनोवृत्ति का परिचायक तो है ही साथ ही साथ इससे शरीर और पर्यावरण को बहुत अधिक हानि होती है। रसायन मिश्रित रंगों का दुष्प्रभाव हमारी आंखों,कानों,त्वचा,बालों,पाचन तंत्र और श्वास तंत्र पर देखने को मिलता है। प्रतिवर्ष होली के बाद इस प्रकार के रोगों से ग्रसित हजारों रोगी हस्पतालों की शरण लेने के लिए विवश होते हैं। होली पर यदि थोड़ा आत्मानुशासन रहे और समाजिकता की सीमाओं को ध्यान में रखा जाए तो इससे अधिक आनंददायक त्योहार कोई और हो ही नहीं सकता।

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